बड़े राहत पैकेज की जरूरत, 14 फीसदी पर पहुंच सकता है देश का वित्तीय घाटा : विशेषज्ञ

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने रविवार को एक वेबपरिचर्चा (वेबीनार) में कहा कि चालू वित्त वर्ष में केंद्र और राज्यों का समग्र वित्तीय घाटा बढ़कर 13-14 फीसदी पर पहुंच सकता है। वहीं एक साक्षात्कार में विश्व बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु ने कहा कि भारत को बड़े स्तर पर राजकोषीय प्रोत्साहन की जरूरत है, क्योंकि देश के सामने कोरोना वायरस महामारी के कारण गंभीर आर्थिक सुस्ती का खतरा खड़ा है। कोरोनावायरस संकट से देश की इकॉनोमी को बचाने के लिए लगातार बड़े राहत पैकेज की मांग की जा रही है। सरकार ने 26 मार्च को 1.7 लाख करोड़ के राहत पैकेज का ऐलान ही किया था।


राजकोषीय घाटा 13-14 फीसदी तक पहुंचने की आशंका
सुब्बाराव ने कहा कि चालू वित्त वर्ष में केंद्र और राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 14 फीसदी स्तर पर पहुंच सकता है। सुब्बाराव ने कहा कि कोरोनावायरस को फैलने से रोकने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन के लिए केंद्र सरकार ने 26 मार्च को जो वित्तीय प्रोत्साहन घोषित किया है, वह 'अपर्याप्त' है। सुब्बाराव एक वेबीनार में बोल रहे थे, जिसका विषय था- कोरोना संकट की चुनौती : आर्थिक पहलू। वेबीनार का आयोजन हैदराबाद के मंथन फाउंडेशन ने किया था।


सरकार द्वारा ज्यादा कर्ज लेने से ब्याज दर बढ़ सकती है
सुब्बाराव ने कहा कि केंद्र को अपना कर्ज घटाना होगा। इस तरह के कर्ज के कई नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं। मसलन ब्याज दरें ऊंचाई पर पहुंच सकती हैं। बता दें कि सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए कर्ज का लक्ष्य 7.8 लाख करोड़ से बढ़ाकर 12 लाख करोड़ कर दिया है। केंद्र सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 0.8 फीसदी के बराबर वित्तीय पैकेज की घोषणा की है। सुब्बाराव ने पूछा, क्या यह पर्याप्त है? 26 मार्च को जब इसकी घोषणा की गई थी, उस समय भी यह कम था। अब तो यह और भी कम लग रहा है।


घाटा कम करने के लिए सरकार को नोट छापने पड़ सकते हैं
कौशिक बसु ने कहा कि सरकार को अपना घाटा पूरा करने के लिए रिजर्व बैंक से नए नोट छापने के लिए कहना पड़ सकता है। बसु ने कहा कि भारत में असमानता पहले से काफी अधिक है और कोरोना वायरस महामारी से इसमें और वृद्धि होगी। उन्होंने कहा कि दुनिया में हर अर्थव्यवस्था संकट संकट से गुजर रही है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। हमें बड़े स्तर पर वित्तीय प्रोत्साहन की जरूरत है। भारत में राजकोषीय प्रबंधन के लिए एफआरबीएम (FRBM) कानून है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकार जरूरत से ज्यादा खर्च नहीं करे। लेकिन एफआरबीएम इस बात को स्वीकार करता है कि प्राकृतिक आपदा के समय हमें अपेक्षाकृत अधिक घाटे की अनुमति होनी चाहिए।


लोगों की आजीविका पर खर्च बढ़ाने की जरूरत
आर्थिक हालत में सुधार को लेकर सुब्बाराव ने कहा कि सरकार को तीन मोर्चों पर अपना खर्च बढ़ाने की जरूरत है। सबसे पहले लोगों की आजीविका पर खर्च बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि 24 मार्च से लॉकडाउन लागू होने के बाद लाखों परिवारों की स्थिति काफी खराब हो गई है। ऐसे में इन परिवारों को सहायता चाहिए, क्योंकि इनकी बचत समाप्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि सरकार के खर्च की पहली चुनौती यह है अधिक से अधिक परिवारों तक मदद पहुंचे। परिवारों को अधिक सहायता दी जाए। वित्त मंत्रालय ने 26 मार्च को 1.70 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी। इसके तहत गरीबों को अगले तीन माह तक खाद्यान्न और रसोई गैस मुफ्त दी जाएगी।


सरकार को हर हाल में खर्च बढ़ाना होगा
सुब्बाराव ने कहा कि सरकार को अधिक खर्च करना है, तो उसे अधिक कर्ज भी लेना होगा। उन्होंने इस विचार से असहमति जताई कि यह असाधारण संकट है इसलिए सरकार खुद को कर्ज की सीमा से बांध नहीं सकती। चालू वित्त वर्ष में केंद्र और राज्य सरकारों का सामूहिक वित्तीय घाटा 6.5 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है। सुब्बाराव ने कहा कि लॉकडाउन की वजह से राजस्व में नुकसान और उसके बाद इसकी वजह से बाजार मूल्य आधारित जीडीपी में नुकसान से राजकोषीय घाटा जीडीपी के 10 फीसदी तक पहुंच जाएगा। इसके साथ ही सरकार द्वारा अतिरिक्त कर्ज लेने से यह जीडीपी के 13-14 फीसदी तक पहुंच जाएगा।


दुनिया को फिलहाल कोरोना के साथ रहना सीखना होगा
उन्होंने कहा कि घरेलू वित्तीय क्षेत्र दबाव में है। कोविड-19 संकट समाप्त होने तक वित्तीय दबाव और बढ़ जाएगा। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और बंपर कृषि उपज से कुछ राहत मिलेगी। सुब्बाराव ने कहा कि दुनिया को कुछ समय तक कोरोना वायरस के साथ रहना सीखना होगा। केंद्र और राज्य दोनों इस महामारी पर काबू पाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कमजोर चिकित्सा ढांचे और जनसंख्या के ऊंचे घनत्व की वजह से भारत के लिए स्थित और गंभीर है। सुब्बाराव ने कहा कि इसमें किसी तरह की खामी से हमें लाखों जिंदगियों से हाथ धोना पड़ेगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि यदि हम कड़ाई के साथ लॉकडाउन से महामारी पर काबू पाते हैं तो लाखों जीवन बचा सकेंगे।


केंद्र राज्यों को दे अधिक खर्च करने की अनुमति
बसु ने कहा कि केंद्र को देश के संघीय ढांचे का सम्मान करते हुए राज्यों को अधिक खर्च की अनुमति देनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यह सब छोटी अवधि के लिये होना चाहिए, क्योंकि लंबे समय तक ऐसा होने से महंगाई दर बढ़ेगी। इधर रेटिंग एजेंसी मूडीज इनवेस्टर सर्विस ने शुक्रवार को कहा कि भारत की विकास दर वित्त वर्ष 2020-21 में घटकर 'शून्य' पर आ सकती है। मूडीज ने वित्तीय घाटा बढ़ने, अधिक सरकारी कर्ज, कमजोर सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचा तथा वित्तीय क्षेत्र की हालत नाजुक रहने का भी संकेत दिया।


नोट छापने में संयम बरतना जरूरी
यह पूछे जाने पर कि क्या देश को सरकारी घाटे के मौद्रिकरण (नोट छाप कर घाटा पूरा करना) की जरूरत है, उन्हेंने कहा कि हमें अतिरिक्त नोट छापने की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन मेरा सुझाव होगा कि संयम बरता जाना चाहिए। भारत में असमानता पहले से अधिक है और यह चिंताजनक है। कोरोना महामारी के कारण असामानता और बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि मैं संपत्ति और विरासत में मिली संपत्ति पर कर लगाने के पक्ष में हूं। किसी को भी अत्यंत गरीबी की स्थिति में नहीं होना चाहिए और बिना संपत्ति और उत्तराधिकर कर के इसे ठीक नहीं किया जा सकता।


अर्थव्यवस्था और समाज का सूक्ष्म स्तर पर हो प्रबंधन
फिलहाल कोरनेल विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बसु ने कहा कि इस संकट की घड़ी में सरकारों को अर्थव्यवस्था और समाज का सूक्ष्म स्तर पर प्रबंधन करना चाहिए। हमें प्रतिभावान नौकरशाहों के साथ सरकार से बाहर के पेशेवरों की जरूरत है जो महामारी और आर्थिक संकट के बीच एक सामंजस्य स्थापित करे। बसु ने कहा अधिक निगरानी वाली अर्थव्यवस्था के दुष्परिणाम हो सकते हैं। वैश्विक पूंजी की निकासी और रुपये की विनिमय दर में गिरावट से साफ है कि वैश्विक कंपनियां इन सबसे चिंतित हैं। भारत की 'लॉकडाउन' से बाहर निकलने की रणनीति के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि यूरोप और पूर्वी एशिया में कई देशों ने पाबंदियों में ढील देनी शुरू कर दी है और विनिमय दर तथा पूंजी प्रवाह के आंकड़े से इसका लाभ देखा जा सकता है।


लंबा लॉकडाउन कई साल की आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है
बसु ने कहा कि भारत के लिए लॉकडाउन से बाहर निकलना इतना आसान नहीं होगा, लेकिन अगर वह प्रतिबद्ध है तो कर सकता है। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस संक्रमण के कारण मौत का आंकड़ा देखे तो भारत में यह आंकड़ा यूरोपीय देशों के मुकाबले कम है। जर्मनी दुनिया का बेहतर प्रबंधित देशों में से एक है लेकिन कोरोना वायरस महामारी के कारण वहां मौत भारत के मुकाबले 80 गुना अधिक है। हमें भयवश स्वयं को बंद रखने की गलती नहीं करनी चाहिए। यह आने वाले कई साल तक आर्थिक झटके का कारण बन सकता है। उल्लेखनीय है कि भारत में 17 मई तक 'लॉकडाउन' है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले 25 मार्च से 21 दिन के देशव्यापी बंद की घोषणा की थी, जो 14 अप्रैल को समाप्त होने वाला था। बाद में इसे 3 मई तक बढ़ा दिया गया। इसके बाद इसे फिर से बढ़ाकर 17 मई तक कर दिया गया है।



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सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए कर्ज का लक्ष्य 7.8 लाख करोड़ रुपए से बढ़ाकर 12 लाख करोड़ रुपए कर दिया है। केंद्र सरकार ने जीडीपी के 0.8 फीसदी के बराबर वित्तीय पैकेज की घोषणा की है।


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Milan Tomic

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